उम्र के निशान

इंद्रधनुषी रंगों से भरे ,
बुलबुले से सपने ,
रात की नाभि पर ,
नींद भर लट्टूओं सा नाचते रहे ।
सुबह की उंगली क्या लगी ,
फूट कर अंधेरों में जा घुले ।
दिन उड़ाता रहा शाम तलक उम्मीद की पतंगें ,
सपनों के इंद्रधनुषी मांजे शाम तलक उंगलियां काटते रहे ।
शाम एक मां की तरह दिन को थपकियां दे कर सुलाती रही ,
और रात उसकी कोख से सपनों की नई पौध काटती रही ,
ना कुछ हुआ , ना कुछ होना था ,
ज़िन्दगी बस उम्र के ,
निशान संभालती रही ।

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Photo by Abhas Mishra

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